मित्रो,
डा. शेरजंग गर्ग मुझ इकसठ बरस के बाल-मना लेखक के पसंदीदा कवि और गुरु भी हैं। खासकर बढ़िया और नायाब शिशुगीत कैसे होते हैं या क्या हो सकते हैं, यह डा. शेरजंग गर्ग से सीखा जा सकता है। और नए ही नहीं, बरसों से लिख रहे पुराने और जमे हुए लेखक भी उऩसे यह गुर सीख सकते हैं--अगर वाकई वे जमकर कुछ करना चाहते हैं तो।
अलबत्ता हो-हो हँसते मि. जोकर में शामिल डा. गर्ग के बड़े ही नटखट और कभी न भूलने वाले शिशुगीतों में से कुछ बढ़िया शिशुगीत यहाँ पढ़िए--
दादी अम्माँ
हलवा खाने वाली अम्माँ,
लोरी गाने वाली अम्माँ।
मुझे सुनातीं रोज कहानी,
नानी की हैं मित्र पुानी।
पापा की हैं आधी अम्माँ,
मेरी पूरी दादी अम्माँ।
राजा-रानी
रामनगर से राजा आए
श्यामनगर से रानी,
रानी रोटी सेंक रही है
राजा भरते पानी।
गुड़िया की शादी
लड्डू, बरफी जमकर खाओ
ढोल मँजीरे खूब बजाओ।
है नन्ही गुड़िया की शादी
नहीं किसी बुढ़़िया की शादी।
चूहा-बिल्ली
बिल्ली-चूहा चूहा-बिल्ली,
साथ-साथ जब पहुँचे दिल्ली।
घूमे लाल किले तक पहले,
फिर इंडिया गेट तक टहले।
घूमा करते बने-ठने से,
इसी तरह वे दोस्त बने से।
चिड़िया
फुदक-फुदककर नाची चिड़िया,
चहल-पहल की चाची चिड़िया।
लाई खबर सुबह की चिड़िया,
बात-बात में चहकी चिड़िया।
(सरला प्रकाशन, दिल्ली से छपी किताब हो-हो हँसते मि. जोकर से सभार।
बच्चों के प्रिय कवि पुस्तक-माला। चयन-संपादनः प्रकाश मनु)