Monday, May 23, 2011

डा. शेरजंग गर्ग के नटखट शिशुगीत

मित्रो,
डा. शेरजंग गर्ग मुझ इकसठ बरस के बाल-मना लेखक के पसंदीदा कवि और गुरु भी हैं। खासकर बढ़िया और नायाब शिशुगीत कैसे होते हैं या क्या हो सकते हैं, यह डा. शेरजंग गर्ग से सीखा जा सकता है। और नए ही नहीं, बरसों से लिख रहे पुराने और जमे हुए लेखक भी उऩसे यह गुर सीख सकते हैं--अगर वाकई वे जमकर कुछ करना चाहते हैं तो।

अलबत्ता हो-हो हँसते मि. जोकर में शामिल डा. गर्ग के बड़े ही नटखट और कभी न भूलने वाले शिशुगीतों में से कुछ बढ़िया शिशुगीत यहाँ पढ़िए--

दादी अम्माँ

हलवा खाने वाली अम्माँ,
लोरी गाने वाली अम्माँ।
मुझे सुनातीं रोज कहानी,
नानी की हैं मित्र पुानी।
पापा की हैं आधी अम्माँ,
मेरी पूरी दादी अम्माँ।

राजा-रानी

रामनगर से राजा आए
श्यामनगर से रानी,
रानी रोटी सेंक रही है
राजा भरते पानी।

गुड़िया की शादी

लड्डू, बरफी जमकर खाओ
ढोल मँजीरे खूब बजाओ।
है नन्ही गुड़िया की शादी
नहीं किसी बुढ़़िया की शादी।

चूहा-बिल्ली

बिल्ली-चूहा चूहा-बिल्ली,
साथ-साथ जब पहुँचे दिल्ली।
घूमे लाल किले तक पहले,
फिर इंडिया गेट तक टहले।
घूमा करते बने-ठने से,
इसी तरह वे दोस्त बने से।

चिड़िया

फुदक-फुदककर नाची चिड़िया,
चहल-पहल की चाची चिड़िया।
लाई खबर सुबह की चिड़िया,
बात-बात में चहकी चिड़िया।

(सरला प्रकाशन, दिल्ली से छपी किताब हो-हो हँसते मि. जोकर से सभार।
बच्चों के प्रिय कवि पुस्तक-माला। चयन-संपादनः प्रकाश मनु)

4 comments:

  1. आपको ब्लॉग-जगत में देखकर बहुत ख़ुशी हुई!

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  2. प्रिय रावेंद्र, मैं तो असल में तुम जैसे नई पी़ढ़ी के उत्साही नौजवानों से सीख रहा हूँ और सीखने की कोई उम्र नहीं होती। मेरे गुरु देवेंद्र सत्यार्थी कहा करते थे कि मैं तो एक नए जन्मे बच्चे से भी सीखने को तैयार हूँ। वे गाँधी जी और टैगोर के साथ रहे थे, पर इतना बड़ा दिल, इतनी उदारता। तुम जैसे लोगों को बड़े मन से अभिव्यक्ति के नए रास्तों पर तेजी से आगे बढ़ते देखता हूँ तो मेरा भी दिल करता है कि साहित्य में सार्थक संवाद का पुल बनने या बनाने के लिए कुछ और नहीं कर सकता, तो अपने आप को रेत बनकर बिखरा दूँ, ताकि तुम जैसे नौजवानों को चलते हुए पैर में काँटे न चुभें। सस्नेह, प्र.म.

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  3. शिशु गीत पढ़कर उन्हें गुनगुनाने लगी और कुछ देर के लिए छोटी सी बच्ची बन गई --ऐसे निराले हैं शिशुगीत !
    सुधा भार्गव

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  4. achchha laga sudha ji. bal sahitya mein hamare pas khazane hain. aur hamin unhen nahin jante.

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